Forest Fire Reduction and Management - Case Study of Uttarakhand

वनाग्नि न्यूनीकरण एवं प्रबंधन - उत्तराखंड का केस अध्ययन

Authors

  • Jaiprakash Jaiswal Research Scholar, Department of Geography, Radhey Hari Government Post Graduate College, Kashipur U.S.Nagar (Uttarakhand) Kumaon University, Nainital

DOI:

https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i11.008

Keywords:

forest, wild, Indian, participation

Abstract

Forest fire is not a new concept in the present era. But nowadays the danger of forest fire has increased more on the huge cover of green vegetation. As the global temperature is increasing. With the increase in forest fire incidents, the temperature of the earth is also increasing. Forests are more vulnerable to forest fires because there is very little rainfall in winter. India sees incidents of forest fires in many geographical areas every year and it is the biggest threat to our biodiversity and wildlife. Every year many wildlife lives are lost due to forest fires. There are 105 national parks and more than 500 sanctuaries in India. In which there is a danger to the wildlife due to this. Uttarakhand is a Himalayan state in which a large number of wild fauna and flora exist. These wild animals and plants are important to our environment. Every year a large number of forest fire incidents take place in Uttarakhand. Being ecologically vulnerable, those forest fires cause damage to a large geographical area of ​​the state. Uttarakhand has 45.32 geographical area under forest area, it is the only North Indian state. Whose forest cover is more than 33 percent which is more than the national average. Most of the incidents of forest fire are anthropogenic, yet more factors are yet to be discovered. Thus the fire may have short term benefits to the residents there but the long term effects are not known to them. The interest of the common man who lives near the forests is linked to that he gets his day-to-day livelihood in the forests. If these forest fire incidents are to be managed, then these incidents can be reduced only through community participation.

Abstract in Hindi Language:

वर्तमान युग में वनाग्नि कोई नई अवधारणा नहीं हैं। परन्तु आजकल हरी वनस्पति के विशाल आवरण पर वनाग्नि का खतरा अधिक बढ़ गया हैं। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ता जा रहा हैं। वनाग्नि की घटनाओं में बढ़ोत्तरी से पृथ्वी का भी तापमान भी बढ़ता जा रहा हैं। वन वनाग्नि के लिए ज्यादा सुभेद्य होते हैं क्योंकि सर्दियों में वर्षा बहुत कम मात्रा में होती हैं। भारत प्रत्येक वर्ष बहुत से भौगोलिक क्षेत्र में वनों की आग की घटनाओं को देखता है और यह हमारी जैव विविधता और वन्य जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा है। प्रत्येक वर्ष बहुत से वन्य जीव का जीवन जंगल की आग के कारण समाप्त हो जाता हैं। भारत में 105 राष्ट्रीय पार्क और 500 से अधिक अभ्यारण्य है। जिनमें वन्य जीव को इसके कारण खतरा विद्यमान है। उत्तराखंड एक हिमालयी राज्य है जिसमें जंगली जीवों एवं वनस्पतियों की एक बड़ी संख्या विद्यमान है। इन जंगली जानवरों और पौधे हमारे पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है। प्रत्येक वर्ष उत्तराखंड में बड़ी संख्या में वनाग्नि की घटनाएँ होती है। पास्थितिकीय रूप से संवेदनशील होने के नाते वे जंगल की आग राज्य के बड़े भौगोलिक क्षेत्र को नुकसान पहुँचाती हैं। उत्तराखंड में वन क्षेत्र के अन्तर्गत 45.32 भौगोलिक क्षेत्र है यह एकमात्र उत्तर भारतीय राज्य है। जिसका वन आवरण 33 प्रतिशत से अधिक है जो राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है। वनाग्नि की अध्किांश घटनाएँ मानवजनित होती है फिर भी और कारकों को खोजना बाकी हैं। इस प्रकार आग से वहाँ के निवासियों को अल्पकालिक लाभ हो सकता हैं लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव उन्हें ज्ञात नहीं हैं। आम आदमी जो जंगलों के पास रहता है उसका हित उससे जुड़ा हुआ वह वनों में दिन-प्रतिदिन की आजीविका प्राप्त करता है। यदि इन वनाग्नि की घटनाओं का यदि प्रबंधन करना है तो सामुदायिक सहभागिता के द्वारा ही इन घटनाओं को कम किया जा सकता है।

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Published

12-11-2021

How to Cite

Jaiswal, J. . (2021). Forest Fire Reduction and Management - Case Study of Uttarakhand: वनाग्नि न्यूनीकरण एवं प्रबंधन - उत्तराखंड का केस अध्ययन . RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary, 6(11), 47–54. https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i11.008